Sunday, October 25, 2020

पहली डिजिटल जिंगल गायन प्रतियोगिताविजेता को 2 लाख रुपये का इनाम कैलाश खेर के साथ वीडियो में गाने का मौका



कोविड 19 ने दुनियां भर को हैरान परेशान कर रखा है लेकिन ऐसी विषम परिस्थितियों में भी कुछ नया करने का जुनून बाकी है इसी कड़ी में नॉरिश ने ईजाद की है पहली डिजिटल जिंगल गाने या बजाने की प्रतियोगिता। विजेता को मिलेगा 2 लाख रुपये का ईनाम, नॉरिश गिफ्ट हैम्पर साथ ही पदमश्री गायक कैलाश खेर के साथ गाने और विडियो में दिखने का मौका। प्रतियोगिता में निशुल्क भाग ले सकते है।

इस प्रतियोगिता को तीन भागों में बांटा गया है पहले भाग में 6 से 10 वर्ष, दूसरे भाग में 11 से 14 वर्ष और तीसरे भाग में 15 से 18 वर्ष उम्र के प्रतियोगी भाग ले सकते है।

प्रतियोगिता के अनुसार कैलाश खेर द्वारा गाये न्यूट्रिशन की सरगम गाने को प्रतिभागियों को अपनी आवाज में गाना है या  वाद्य यंत्रों से भी सुर दिये जा सकते है । प्रतिभागियों को अपने गाने या वाद्य यंत्र पर बजाए गाने का वीडियो प्रतियोगिता में शामिल करने के लिए ऑनलाइन भेजना होगा।

प्रतिभागी इस एंथम गीत को नॉरिश की वेबसाइट www.nourishstore.co.in या सोशल मीडिया चैनल के साथ कैलाश खेर के सोशल मीडिया चैनल पर भी पा सकते है। 

प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए प्रतिभागियों को इवेन्ट माइक्रोसाइट पर रजिस्टर करना होगा और अपना वीडियो भी इसी माइक्रोसाइट पर पोस्ट करना होगा।

प्रतियोगिता में शामिल प्रत्येक एंट्री को संगीत विशेषज्ञों की टीम सुनेगी और प्रत्येक भाग से सर्वश्रेष्ठ 30 प्रतिभागियों का चुनाव करेगी। सभी चुने हुए प्रतिभागी अगले राउंड जिसे बैटल राउंड नाम दिया गया है में शामिल होकर ज़ूम जैसे प्लेटफार्म पर लाइव परफॉर्म करेंगे। इस राउंड में दर्शक भी अपने चहेते गायक को वोट दे सकते है। 

90 प्रतिभागियों को 8 चरणों मे भाग लेने के बाद सर्वश्रेष्ठ 9 प्रतिभागी चुने जायेंगे। इन चुने हुए 9 प्रतिभाशाली गायकों में से प्रत्येक भाग के सर्वश्रेष्ठ गायक की घोषणा कैलाश खेर फेसबुक लाइव इवेंट में करेंगे और चुने हुए तीन गायको को अपने साथ वीडियो में गाने का निमंत्रण भी देंगे।

नॉरिश के कार्यकारी निदेशक आशीष खण्डेलवाल का कहना है  नॉरिश बच्चों को स्वस्थ रखने के साथ ही प्रतिभाशाली बच्चों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका भी मिलता रहे ऐसा हमारा सोचना है । हम भविष्य में भी ऐसी प्रतियोगिता करते रहेंगे।

कैलाश खेर ने इस मौके पर कहा मैं नॉरिश और आशीष जी को इस संगीत प्रतियोगिता के लिए बधाई देता हूँ और धन्यवाद देता हूँ कि मुझे प्रतिभाशाली गायको को सुनने चुनने का मौका दिया। मुझे उम्मीद है इस प्रतियोगिता में बच्चे और युवा गायक बड़ी संख्या में शामिल होकर अपनी प्रतिभा निखारेंगे

Tuesday, October 13, 2020

हँसता मुस्कुराता चेहरा टुनटुन

हास्य अभिनेत्री टुनटुन का नाम आते ही हम सभी के चेहरों पर एक मुस्कान सी आ जाती है। टुनटुन जब भी परदे पर नज़र आती थी दर्शक गुदगुदाये बिना नहीं रहते थे। टुनटुन का असली नाम उमा देवी खत्री था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के अलीपुर गाँव में ११ जुलाई १९२३ को हुआ था। जब वो दो - ढाई बरस की थी तभी उनके माता - पिता गुज़र गये थे।  टुनटुन का एक भाई था जो उनसे आठ - नौ बरस बड़ा था , उसका नाम हरी था वो भी जब टुनटुन तीन - चार बरस की रही होंगी वो भी गुज़र गया। ऐसे में उनके चाचा ने उनकी परवरिश की। 

बचपन में रेडियो सुन - सुन कर उमा को गाने का शौक हो गया। उनकी दिली तमन्ना थी कि वो फिल्मों में गीतों को गाये। लेकिन उस दौर में लड़कियों को फिल्मों में गायिका बनना तो दूर उनकी पढ़ाई होना तक मुश्किल था। ऐसे में किसी तरह वो मुंबई आ गयी और सीधे वो संगीतकार नौशाद से मिली और उन्होंने उनसे अनुरोध किया कि वो उन्हें फिल्म में गाने का मौका दें । नौशाद के सामने वो जिद पर अड़ गईं कि अगर उन्हें गाने का मौका नहीं मिला, तो वो समुद्र में कूद जायेंगी। नौशाद साहब ने टुनटुन का छोटा सा ऑडिशन लिया और उनकी आवाज से प्रभावित होकर उन्हें तुरंत काम दे दिया।इस तरह उन्होंने पहला गाना गाया नाज़िर की फिल्म "वामिक अज़रा " ( १९४६ ) में। इसके बाद उन्हें गाना " अफसाना लिख रही हूँ दिल बेक़रार का " ( दर्द - १९४७ ) मिला जिस गाने को आज भी श्रोता सुनना पसंद करते हैं। इस गीत के बाद टुनटुन की तो जैसे लॉटरी निकल गई। उन्होंने एक - एक करके करीब ५० गीतों को गाया। फिर वो अपनी शादीशुदा व्यस्त हो गयी। लेकिन फिर कुछ पारिवारिक मजबूरी के चलते उन्होंने दोबारा फिल्मों में गीत गाने के बारें में सोचा लेकिन उस समय की गायिकाओं लता मंगेशकर और आशा भोंसले के सामने उनका गाना मुश्किल था ऐसे में संगीतकार नौशाद ने ही उमा देवी से कहा कि, "वो फिल्मों में अभिनय क्यों नहीं करती।" क्योंकि उमा देवी का खुशनुमा मिज़ाज़ और गज़ब की कॉमिक टाइमिंग थी । उमा देवी ने नौशाद साहब की बात सुन कर कहा कि , " मैं फिल्म में काम तभी करूँगी अगर इस फिल्म में दिलीप कुमार भी होंगे। इत्तेफाक से उनकी पहली फिल्म "बाबुल " के नायक दिलीप कुमार ही थे।  बस इसी फिल्म से हम सबकी प्रिय "टुनटुन" का जन्म हुआ। क्योंकि इससे पहले वो उमा देवी के नाम से गीतों को गाती थीं। जब उमा देवी ने फिल्मों में काम करने के बारें में सोचा , उनका वजन भी बढ़ चुका था ऐसे में उनके गोल मोल शरीर को देखकर उनके प्रिय अभिनेता दिलीप कुमार ने ही उनका नाम टुनटुन रख दिया।       

५ दशको तक टुनटुन ने हिंदी , उर्दू और पंजाबी भाषा की करीब १९८ फिल्मों में काम किया।उन्होंने अपने समय के सभी बड़े हास्य कलाकारों जैसे भगवान दादा, आगा , सुन्दर, मुकरी , धूमल , जॉनी वॉकर और केश्टो मुखर्जी के साथ काम किया है। उमा के टुनटुन नाम रखते ही वो दर्शकों में लोकप्रिय होती चली गयी। हालाँकि हर फिल्म में उनके भारी शरीर का मजाक बनता था और दर्शक भी उनको परदे पर देखते ही हँस हँस कर लोट पोट हो जाते थे। अपने भारी आकार के चलते टुनटुन आज भी हम सबके बीच लोकप्रिय हैं कि जब हम किसी मोटी महिला को देखते हैं  तो उसे  टुनटुन
कहते हैं।     

टुनटुन ने फिल्म  बाबुल (१९५० ) से अभिनय की ओर पहला कदम रखा और इसके बाद उन्होंने बाज ,आर पार ,उड़न खटोला , मिस्टर एंड मिसेज ५५, श्री ४२० , मिस कोकाकोला, राजहठ, बेगुनाह, उजाला, कोहिनूर, नया अंदाज़, १२ ओ क्लॉक, दिल अपना और प्रीत पराई, कभी अन्धेरा कभी उजाला, मुजरिम, जाली नोट, एक फूल चार कांटे, कश्मीर की कली, अक़लमन्द, सीआईडी 909, दिल और मोहब्बत, एक बार मुस्कुरा दो , अन्दाज़, जागते रहो ,पॉकेटमार ,सी आई डी ,प्यासा , कागज़ के फूल , दिल भी तेरा हम भी तेरे ,बंबई का बाबू ,गंगा जमुना , प्रोफ़ेसर ,चौहदवी का चाँद , सन ऑफ़ इंडिया उस्तादों के उस्ताद , शिकारी, गहरा दाग ,एक दिल सौ अफ़साने , ब्लफ मास्टर ,मिस्टर एक्स इन बॉम्बे , कश्मीर की कली , गंगा की लहरें ,राजकुमार ,काजल , जब जब फूल खिलें ,अली बाबा ४० चोर , फूल और पत्थर , दिल दिया दर्द लिया ,उपकार , आखिरी खत ,आबरू , बहारों की मंजिल ,साधु और शैतान शराफत , दो रास्ते गीत , आंसू और मुस्कान ,हीर राँझा , जौहर महमूद इन हांगकांग ,हलचल , हँगामा , समाधि , मोम की  गुड़िया ,बेईमान , अपराध , बिंदिया और बन्दूक ,आँखों आँखों में , गोमती के किनारे ,बंधे हाथ , कच्चे धागे ,ठोकर , शैतान , नया दिन नई रात ,अमीर गरीब , धोती लोटा और चौपाटी ,रंगीला रतन , बंडलबाज़,आपबीती , नागिन ,अमानत , चाचा भतीजा ,  सत्यम शिवम सुंदरम ,अँखियो के झरोखे से , लोक परलोक ,बातों बातों में , कुर्बानी , बीवी ओ बीवी , सन्नाटा ,नमक हलाल, हथकड़ी, डिस्को डांसर पेंटर बाबू , हादसा , कुली दीवाना तेरे नाम का , कसम धंधे की, आदि फिल्मों में अभिनय किया और अपने चाहने वालों को जी भर कर हँसाया। 

टुनटुन का नाम सुनते ही एक गोल-मटोल काया और हँसता-मुस्कुराता चेहरा आज भी हमारी आँखों के सामने नाच उठता है। टुनटुन को बॉलीवुड की पहली सबसे सफ़ल महिला कॉमेडियन कहा जाये, तो गलत न होगा। उस दौर में अपनी कॉमेडी से उन्होंने जो ख्याति अर्जित की, उतनी ख्याति किसी अन्य महिला कॉमेडियन को हासिल नहीं हुई। गोल मटोल हम सबकी टुनटुन ने ८० साल की उम्र में २३ नवम्बर २००३ को मुंबई में अंतिम साँस ली। 

हास्य अभिनय का पर्याय महमूद

हास्य अभिनय का पर्याय माने जाने वाले अभिनेता, गायक , निर्माता , निर्देशक महमूद का पूरा नाम महमूद अली है।इनका जन्म २९ सितम्बर १९३२ को बॉम्बे में हुआ था।इनके पिता मुमताज़ अली एक लोकप्रिय अभिनेता और नर्तक थे, जो कि बॉम्बे टॉकीज़ में काम किया करते थे । बचपन से ही अभिनय की ओर रुझान था महमूद का। उनके इसी रुझान को देखते हुए उनके पिता ने १९४३ में बॉम्बे टॉकीज़ की बन रही फिल्म "किस्मत " में अशोक कुमार के बचपन की भूमिका के लिए उनकी सिफारिश भी की।  

चार दशकों से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों में अभिनय करने वाले महमूद ने यूँ तो अनेकों फिल्मों में अभिनय किया है और अपने अभिनय से दर्शकों को  हँसाया भी है ।लेकिन उनकी कुछ फिल्मों की भूमिकायें आज भी दर्शकों के दिलों में ताज़ा है। १९६५ में आयी फिल्म "गुमनाम " में बटलर की भूमिका थी उनकी। इस फिल्म में उन्होंने हैदराबादी भाषा बोली थी और दर्शकों का दिल लूट लिया था। इसी तरह १९६८ में आयी फिल्म "पड़ोसन " में वो अभिनेत्री सायरा बानो के संगीत गुरु मास्टर पिल्लै बने थे। क्या गज़ब की भूमिका थी इस फिल्म में उनकी। आज भी जब हम फिल्म "पड़ोसन " की बात करते हैं सबसे पहले महमूद का ही चेहरा हमारे सामने आता है।१९६६ की  फिल्म "प्यार किये जा " में महमूद अपने पिता बने अभिनेता ओम प्रकाश को अपनी हॉरर फिल्म की कहानी जिस तरह से सुनाते हैं। उसे देखकर भी दर्शकों को आज भी बहुत मज़ा आता है।१९७२ की फिल्म "बॉम्बे टू गोवा " में उनकी बस कंडक्टर की भूमिका भी बहुत ही लाजवाब थी। इस फिल्म का गाना "  मुत्तु कोड़ी कवारी हड़ा" को आज भी दर्शक सुनते हैं। १९७० में प्रदर्शित फिल्म ‘हमजोली’ में महमूद के अभिनय के विविध रूप दर्शकों को देखने को मिले। इस फिल्म में महमूद ने तिहरी भूमिका अभिनीत की थी।  १९७३ में आयी फिल्म "दो फूल " में महमूद की दोहरी भूमिका थी।
 
३०० के करीब फिल्मों में काम कर चुके हास्य अभिनेता कभी घर की आर्थिक जरूरत को पूरा करने के लिये महमूद, मलाड और विरार के बीच चलने वाली लोकल ट्रेन में टॉफिया बेचा करते थे। फिल्मों में अभिनय करने से पहले उन्होंने कार चलाना सीखा और निर्माता ज्ञान मुखर्जी ,गीतकार गोपाल सिंह नेपाली, भरत व्यास, राजा मेंहदी अली खान ,निर्माता पी.एल. संतोषी आदि के घर पर ड्राइवर का काम भी किया। महमूद ड्राइवर का काम भी कर रहे थे और जब मौका मिला जाता तो फिल्मों में काम भी कर लेते थे। ऐसा ही कुछ वाकया हुआ १९५१ में आयी फिल्म "नादान " की शूटिंग के दौरान। हुआ यूँ कि अभिनेत्री मधुबाला की एक जूनियर कलाकार  के साथ शूटिंग थी लेकिन वो बेचारा कलाकार १० रीटेक के बाद भी अपना संवाद सही से नहीं बोल पा रहा था। फिल्म निर्देशक हीरा सिंह ने महमूद को यह संवाद बोलने के लिये कहा , बस क्या था एक ही टेक में महमूद ने संवाद बोल दिया। इस काम के महमूद को ३०० रूपये मिले जबकि बतौर ड्राइवर महमूद को महीने मे मात्र ७५ रुपये ही मिला करते थे। इसी के चलते बाद में उन्होंने अपना नाम जूनियर आर्टिस्ट एसोसिएशन में दर्ज करा लिया।  इसके बाद बतौर जूनियर आर्टिस्ट महमूद ने दो बीघा जमीन, जागृति, सी.आई.डी, प्यासा जैसी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल किये।

अभिनेता महमूद ने अनेकों फिल्मों में अभिनय किया लेकिन उन्हें भी  ए वी मयप्पन द्वारा स्थापित भारतीय फिल्म निर्माण स्टूडियो एवीएम प्रोडक्शंस कंपनी ने  फिल्म "मिस मैरी" के लिये दिये स्क्रीन टेस्ट में फेल कर दिया, यह कह कर कि महमूद ना कभी अभिनय कर सकते हैं ना ही अभिनेता बन सकते है। लेकिन बाद के दिनों में एवीएम बैनर ने महमूद को लेकर बतौर अभिनेता फिल्म ‘मैं सुदर हूं’  का निर्माण भी किया। इसी तरह महमूद अपने रिश्तेदार कमाल अमरोही के पास फिल्म में काम मांगने के लिये गये तो उन्होंने भी महमूद को यह कह दिया कि आप अभिनेता मुमताज अली के पुत्र हैं और जरूरी नहीं है कि एक अभिनेता का पुत्र भी अभिनेता बन सके। आपके पास फिल्मों में अभिनय करने की योग्यता नहीं है। आप चाहे तो मुझसे कुछ पैसे लेकर कोई अलग व्यवसाय कर सकते हैं।

अभिनेता महमूद ने फिल्मों में किसी की भी सिफारिश पर काम करना पसंद नहीं किया। उन्होंने फिल्मों में जो भी मुकाम पाया खुद अपने ही बल पर।
१९६१ में महमूद ने अपनी पहली फिल्म ‘छोटे नवाब’ का निर्माण किया और अपनी फिल्म में उन्होंने आर .डी. बर्मन उर्फ पंचम दा को बतौर संगीतकार फिल्म इंडस्ट्री में पहली बार पेश किया। महमूद ने कई फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। महमूद ने कई फिल्मों में अपने पार्श्वगायन से भी श्रोताओं को अपना दीवाना बनाया। महमूद को अपने सिने कैरियर में तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। निर्देशक के रूप में उन्होंने १९६५ में आयी भूत बंगला ,१९७४ में कुंवारा बाप ,१९७६ में जिनी और जॉनी ,१९७८ में एक बाप छ बेटे और १९९६ में दुश्मन दुनियाँ का आदि फिल्मों का बनाया है।  
बाद में महमूद का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। वह इलाज के लिए अमेरिका गये।  जहाँ २३  जुलाई २००४ को ७१ की आयु में  उनका निधन हो गया।

मुकरी एक काज़ी भी थे अभिनेता से पहले

कभी उन्होंने हमें तैय्यब अली बन कर हँसाया और कभी नत्थू लाल बन कर , जी हाँ हम बात कर रहे हैं हमेशा अपने चेहरे पर मुस्कान लिये हुए उस अभिनेता मुकरी की जिसने करीब ५० साल तक फिल्मों में सशक्त अभिनय करके दर्शकों का मनोरंजन किया। मुकरी का जन्म ५ जनवरी १९२२ को अलीबाग के कोंकणी मुस्लिम परिवार में हुआ। 

मुकरी का पूरा नाम मोहम्मद उमर मुकरी था।  फिल्मों में आने से पहले वो एक क़ाज़ी के रूप में काम करते थे। बच्चों को मदरसे में कुरान पढ़ाते थे। यह सब करने के बावजूद उनकी आय बहुत सीमित थी जिससे घर का खर्च चल पाना संभव नहीं था। इसी के चलते मुकरी ने फिल्मों में काम करने के बारें में सोचा। इस बारे में उन्होंने अपने स्कूल के मित्र दिलीप कुमार से बात की। दिलीप कुमार के कहने पर ही उन्हें बॉम्बे टॉकीज़ में उन्हें जूनियर सहायक की नौकरी मिल गयी। बाद में उन्होंने निर्देशक के आसिफ के सहायक के तौर पर भी काम किया। इसके कुछ समय बाद में उन्होंने पूरी तरह फिल्मों में अभिनय करना शुरू कर दिया।  

 ६०० फिल्मों में अभिनय कर चुके मुकरी ने फिल्मों में अपना अभिनय सफर शुरू किया १९४५ में अपने स्कूल मेट्स दिलीप कुमार के साथ फिल्म "प्रतिमा " में।  अभिनेता दिलीप कुमार के साथ मुकरी की गहरी दोस्ती थी साथ ही दोनों ने अनेकों फिल्मों में भी काम किया। इसके अलावा अभिनेत्री निम्मी उनके पति अली रजा , अभिनेता महमूद और नर्गिस भी मुकरी के दोस्तों में शामिल थे। नर्गिस तो मुकरी की सगी बहन जैसी ही थीं। 

दर्शकों को हँस हँस का लोट पोट कर देने वाले मुकरी अपनी असली जिंदगी में बहुत ही धार्मिक इंसान थे हालाँकि वो फिल्मों में अभिनय करते थे लेकिन उनके बच्चों को फ़िल्में देखने की इज़ाज़त नहीं थी। लम्बू यानि अमिताभ बच्चन और टिंकू यानि मुकरी की जोड़ी को भी दर्शकों ने बहुत पसंद किया। हम सभी को फिल्म "शराबी " का यह संवाद "मूछें हो तो नत्थू लाल जैसी वरना न हों " आज भी याद। यह संवाद अमिताभ बच्चन ने मुकरी के लिए ही बोला था। इस फिल्म के अलावा दोनों ने गंगा की सौगंध, नसीब, मुक़द्दर का सिकंदर, लावारिस, महान, कुली , खुद्दार ,अमर अकबर अन्थोनी ,गंगा जमुना सरस्वती , जादूगर आदि फिल्मों में साथ में काम किया। 

वैसे तो मुकरी ने अनेकों फिल्मों में अभिनय किया है लेकिन जब - जब हम उनके हास्य अभिनय का जिक्र करते हैं तो फिल्म "अमर अकबर एंथोनी " के तैय्यब अली का जिक्र जरूर आता है। इस फिल्म में वो अभिनेत्री नीतू सिंह के अब्बा की भूमिका में थे।  इस फिल्म में उनके किरदार पर एक गीत भी था "तैय्यब अली प्यार का दुश्मन।" १९७२ में आयी फिल्म "बॉम्बे टू गोवा " में दक्षिण भारतीय के किरदार में उन्होंने दर्शकों को खूब हँसाया। १९६७ में आयी फिल्म "मिलन " में जग्गू के किरदार में भी उन्होंने बहुत रंग जमाया। फिल्म "सुहाना सफर " में उन्होंने शशि कपूर के दोस्त बन कर दर्शकों का मनोरंजन किया। फिल्म " कुँवारा बाप" और फिल्म "पड़ोसन" में उन्होंने शानदार अभिनय किया था। 

पाँच बच्चों के पिता मुकरी की आखिरी फिल्म थी १९८४ में आयी फिल्म "शराबी। " उनकी कुछ अन्य फ़िल्में इस प्रकार थीं --   आन , अनोखा प्यार , सज़ा, बाग़ी , अमर , पैसा ही पैसा ,  मिर्ज़ा ग़ालिब , इनाम ,चोरी चोरी , आवाज़ , मदर इंडिया ,सोहनी महिवाल , मालिक , काला पानी ,काली टोपी लाल रुमाल ,कोहिनूर ,अनाड़ी , अनुराधा ,संगीत सम्राट तानसेन , बड़ा आदमी ,सन ऑफ़ इंडिया , असली नकली , मनमौजी, देवकन्या , बहूरानी , फूल बने अँगारे ,हिमालय की गोद में ,जौहर महमूद इन गोवा ,बहू बेटी ,  स्मगलर ,मेरा साया , सूरज ,मेहरबान , फ़र्ज़ ,चंदन का पालना , अनीता, वासना , साधु और शैतान ,नन्हा फरिश्ता , आबरू , राजा और रंक ,चिराग , भाई - बहन , दो रास्ते ,मेरा नाम जोकर , गोपी ,देवी , दर्पण , भाई भाई , बचपन , प्रेम पुजारी ,मैं सुन्दर हूँ , लाखों में एक ,जौहर महमूद इन हॉन्ग कॉंग ,ज्वाला , एक नारी एक ब्रह्मचारी , अलबेला , उपासना , प्यार की कहानी ,अपराध , पिया का घर ,सूरज और चंदा , मेरे गरीब नवाज़ ,मेहमान , हनीमून ,हीरा , लोफर , दुनिया का मेला ,दो फूल , नया दिन नयी रात ,बंडलबाज , बैराग, अर्जुन पंडित, सबसे बड़ा रुपया , फकीरा , चाँदी सोना ,अमानत ,अब्दुल्ल्ह , द बर्निग ट्रेन,क़र्ज़ , उमराव जान , कातिलों के कातिल , धर्म  काँटा , विधाता , अनोखा बंधन ,हम दोनों , बाबू ,कर्मा , परिवार ,हवालात, राम लखन , गैर कानूनी, दाता , बेताज बादशाह आदि। 

अपने हास्य अभिनय से दर्शकों का दिल जीतने वाले मुकरी का इंतकाल ७८ वर्ष का अवस्था में ४ सितम्बर २००० को मुंबई के लीलावती अस्पताल में हुआ।

लाजवाब हास्य कलाकार सतीश शाह

बड़े परदे के साथ - साथ उन्होंने अपने अभिनय का जलवा छोटे परदे पर भी बिखेरा और जी भर कर दर्शकों को हँसाया। जी हाँ हम बात कर रहे हैं हास्य अभिनेता सतीश शाह की।  जिन्होंने फिल्म "मैं हूँ ना  " में टीचर बन कर हँसाया तो फिल्म "भूतनाथ" में ऐसे प्रिंसिपल की भूमिका निभायी जो बच्चों का टिफिन खा जाता था। २५ जून १९५१ को जन्मे सतीश शाह ने हिंदी फिल्मों के साथ - साथ मराठी फिल्मों में भी अभिनय किया है। उन्होंने अपना अभिनय कॅरियर शुरू किया १९७० में फिल्म "भगवान परशुराम " से।लेकिन सतीश दर्शकों में लोकप्रिय हुए १९८४ के टी वी धारावाहिक "ये जो है जिंदगी " से। कुंदन शाह और मंजुल सिन्हा के इस धारावाहिक में उन्होंने ५५ एपिसोड में ५५ अलग - अलग किरदार अभिनीत किये ,जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है।  

सतीश शाह की कॉमिक टाइमिंग बहुत ही गज़ब की है।  उन्होंने १९९५ में ज़ी टी वी पर प्रसारित शो "फ़िल्मी चक्कर " में काम किया और यहाँ भी उन्होंने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया। हास्य धारावाहिक "साराभाई वर्सेज साराभाई " में उन्होंने इंद्रवदन की भूमिका बहुत ही लाजवाब तरीके से निभाई। यह हास्य धारावाहिक आज भी दर्शकों में बहुत लोकप्रिय है।इन दोनों ही धारावाहिकों में उनकी जोड़ी अभिनेत्री रत्ना पाठक शाह के साथ थी। अभिनेत्री स्वरूप सम्पत के साथ इन्होने ये जो है जिंदगी और ऑल डी बेस्ट आदि दो धारावाहिकों में  काम किया। २००७ में हास्य शो "कॉमेडी सर्कस " में उन्होंने जज की भी भूमिका भी निभायी।

यूँ तो सतीश शाह ने करीब २५० फिल्मों में अभिनय किया है लेकिन उनकी कुछ भूमिकायें ऐसी हैं जिन्हें आज भी याद करने से हम सभी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती हैं।  सबसे पहले हम बात करते हैं १९८४ में आयी फिल्म "जाने भी तो यारों " की। निर्देशक कुंदन शाह की इस फिल्म में उन्होंने नगर निगम आयुक्त  डी मेलो की भूमिका निभायी थी। बहुत ही अच्छा अभिनय किया था उन्होंने। यह फिल्म क्लासिक फिल्म मानी जाती है। १९८८ में आयी फिल्म "मालामाल " में उनकी शानदार भूमिका थी। १९९४ की फिल्म "कभी हाँ कभी ना " में सतीश ने साइमन का किरदार अभिनीत किया था। इसी साल आयी फिल्म "हम आपके  कौन " में उन्होंने हँसने हँसाने वाले डॉ बनकर दर्शकों का मनोरंजन किया। १९९५ की सबसे लोकप्रिय फिल्म "दिल वाले दुल्हनियाँ ले जायेगें " में सतीश ने अमरीश पुरी के दोस्त अजित सिंह का किरदार अभिनीत किया था। १९९६ की फिल्म "जुड़वाँ " में उन्होंने हवलदार बन कर दर्शकों को खूब हँसाया।१९९९ की लोकप्रिय फिल्म "हम साथ - साथ हैं " में सतीश ने अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे के पिता की भूमिका अभिनीत की। २००२ की फिल्म "साथिया " में उन्होंने विवेक ओबेरॉय के पिता की सशक्त भूमिका अभिनीत की। यही नहीं उन्होंने फिल्म "चलते चलते" मनुभाई का शानदार किरदार अभिनीत किया।फिल्म "कल हो न हो " में उन्होंने सैफ अली खान पिता कृष्ण भाई पटेल यानि एक गुज्जू की भूमिका अभिनीत की। इसी तरह "मस्ती " में डॉ कपाड़िया बने सतीश शाह और फिल्म  "मैं हूँ ना " में ऐसे प्रोफ़ेसर का किरदार निभाया जो कि जब जब बात करता था उसके मुँह से इतना थूक निकलता था सामने वाले के चेहरे पर गिरता था।   २००७ में आयी फिल्म "ओम शांति ओम " में वो पार्थो दास बने , भूतनाथ में  वो प्रिंसिपल बने तो कि छोटे छोटे बच्चों का टिफिन खा जाता था। २०११ में आयी शाहरुख़ खान की फिल्म "रा वन" में वो अय्यर अंकल बने  . सतीश शाह की आखिरी फिल्म आयी २०१४ में साजिद खान की "हमशकल्स। " इसमें वो वाय एम राज के किरदार में थे।   

इन फिल्मों के अलावा कुछ अन्य फिल्मों में भी उन्होंने अभिनय किया, वो हैं ---अरविन्द देसाई की अजीब दास्ताँ , गमन , उमराव जान ,अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है ,शक्ति , पुराना मंदिर ,अनोखा रिश्ता , मैं बलवान , अपने अपने , कलयुग और रामायण ,जान हथेली पे , मार धाड़ , वीराना ,साथ -साथ , अर्ध सत्य ,मोहन जोशी हाज़िर हो , भगवान दादा , अंजाम , आग और शोला ,लव ८६ , घर में राम गली में श्याम ,घर वाली बाहर वाली ,पुरानी हवेली ,हातिम ताई , मेरा पति सिर्फ मेरा है ,थानेदार , जान पहचान ,बेनाम बादशाह , नरसिम्हा ,आशिक आवारा , सैनिक बाज़ी , अकेले हम अकेले तुम ,साजन चले ससुराल ,हीरो नंबर वन , हिमालय पुत्र , गुलाम ए मुस्तफा , सात रंग के सपने, प्रेम अगन , तिरछी टोपी वाले , कहो न प्यार है, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी ,इश्क़ विश्क , हर दिल जो प्यार करेगा ,ओम जय जगदीश ,मुझसे दोस्ती करोगे , जीना सिर्फ मेरे लिए , मुझसे शादी करोगी , राम जी लंदन वाले ,शादी नंबर वन , फ़ना , दीवाना तेरे नाम का , जस्ट मैरिड ,मिलेगें मिलेगें , खिचड़ी रमैया वस्तावैया ,क्लब ६० आदि। 

सतीश शाह का पूरा नाम सतीश रविलाल शाह है। इनकी अभिनय को अपना पेशा बनाने के पीछे भी कहानी है वो यह कि वो बचपन से ही सतीश खेलों के शौक़ीन थे और इसी क्षेत्र में ही अपना कैरियर बनाना चाहते थे लेकिन एक बार स्कूल के स्टेज पर वो उन्होंने ऐसा शानदार अभिनय किया और तारीफें पायी बस उन्होंने सोच लिए कि अब तो फिल्मों में अभिनय करना ही है। 

सतीश शाह को भी कोरोना हो गया था लेकिन अब वो पूरी तरह से स्वस्थ होकर अपने घर में आराम कर रहे हैं।  

Tuesday, September 15, 2020

बस कंडक्टर से कैसे बने हास्य कलाकार -- जॉनी वॉकर


"सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये " यह लोकप्रिय गीत तो आप सभी सुना होगा और गुनगुनाया भी होगा।  फिल्म "प्यासा "  के इस गीत को परदे पर हास्य अभिनेता जॉनी वॉकर पर फिल्माया गया था।  ११ नवम्बर १९२६ को जन्मे जॉनी वॉकर का असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी था। जॉनी वॉकर नाम तो उन्हें अभिनेता गुरुदत्त ने दिया था। आइये जानते हैं एक बस कंडक्टर से लोकप्रिय हास्य अभिनेता कैसे बने  बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी। 

३०० के करीब हिंदी फिल्मों में अपने अभिनय की छाप छोड़ने वाले जॉनी वॉकर का जन्म इंदौर में हुआ था। वहां उनके पिता एक मिल में काम करते करते थे। रोजी -  रोटी की तलाश में उनका परिवार बॉम्बे चला आया। बॉम्बे में बदरुद्दीन जमालुद्दीन काज़ी ने अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए कभी फल बेचे कभी सब्जी तो कभी उन्होंने आइस क्रीम भी बेची और फिर बाद में उनकी नौकरी एक बस कंडक्टर के रूप में लग गयी। हालाँकि वो नौकरी करते थे लेकिन उनका सपना था फिल्मों में हास्य कलाकार बनने का। बदरुद्दीन नूर मोहम्मद चार्ली के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उनके द्वारा परदे पर अभिनीत अदाकारी को अपने जीवन में करके लोगों को हँसाया करते थे। यहां तक वो अपनी मिमिक्री से बस के यात्रियों का मनोरंजन भी किया करते थे। ऐसी ही किसी बस में लोकप्रिय अभिनेता बलराज साहनी ने बदरुद्दीन को देखा और अभिनेता गुरुदत्त से मिलवाया।

अभिनेता बलराज साहनी उन दिनों फिल्म "बाज़ी " लिख रहे थे। उन्होंने बदरुद्दीन को गुरुदत्त के ऑफिस में बुलाया जहाँ गुरुदत्त चेतन आनंद के साथ किसी बात पर चर्चा कर रहे थे, तभी कहीं से बदरुद्दीन आ गये शराबी बन कर  उन दोनों के बीच में पँहुच गये और गुरुदत्त को परेशान करने लगे। जब गुरुदत्त कुछ ज्यादा ही परेशान हो गये तब उन्होंने अपने स्टाफ को हिदायत दी कि शराबी बने बदरुद्दीन को ऑफिस से बाहर निकालने की। तभी बलराज साहनी आ गये और जोर -- जोर से हँसने लगे और उन्होंने गुरुदत्त को बदरुद्दीन के बारें में सब बताया। बदरुद्दीन के अभिनय से इतने प्रभावित हुए गुरुदत्त कि उन्होंने अपनी फिल्म "बाज़ी " में उन्हें काम भी दे दिया साथ ही उन्होंने जॉनी वॉकर शराब के एक लोकप्रिय ब्रांड के नाम पर  बदरुद्दीन को नया नाम जॉनी वॉकर भी दिया। बस तभी से बदरुद्दीन हम सबके जॉनी वॉकर बन गये। फिल्म "बाज़ी" के बाद जब भी गुरदत्त ने कोई फिल्म बनाई उन्होंने जॉनी वॉकर को अपनी फिल्म में एक महत्वपूर्ण भूमिका अवश्य ही दी। गुरुदत्त और जॉनी वॉकर ने एक साथ बाज़ी ,आर पार, मिस्टर ऐंड मिसेज ५५ , सीआईडी, प्यासा, कागज के फूल आदि फिल्मों में काम किया है। 

हास्य अभिनेताओं पर गीत फिल्माने का सिलसिला भी अभिनेता जॉनी वॉकर के समय में ही हुआ।फिल्म 'आर पार' का गाना 'अरे तौबा तौबा' जॉनी वाकर पर फिल्माया गया पहला गाना था। बाद में उन पर सर जो तेरा चकराए , ये है बम्बई मेरी जान, जाने कहां मेरा जिगर गया जी, जंगल में मोर नाचा किसने देखा, गरीब जानके हमको न तुम भुला देना, हम भी अगर बच्चे होते और मैं बम्बई का बाबू जैसे कई सदाबहार गाने उन पर  फिल्माये गये। जॉनी वॉकर  के  गीतों की लोकप्रियता का आलम यह था कि फिल्म निर्माता विशेष रूप से  लिये अपनी फिल्मों में उनके गीतों को रखवाने लगे। जॉनी वॉकर  ही पहले ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने सेकेटरी रखने का चलन शुरू किया।  सबसे पहले जॉनी वॉकर ने ही संडे को शूटिंग नहीं करने का फैसला किया। 

 हास्य भूमिकाओं में जॉनी इस कदर जमे कि उन्हें मुख्य भूमिका में लेकर मिस्टर कार्टून एम.ए. ,जरा बचके, रिक्शावाला, मिस्टर जॉन जैसी फिल्में बनने लगीं। एक फिल्म तो उनके ही नाम 'जॉनी वाकर' भी थी । जॉनी वॉकर ने जब भी किसी किरदार को अभिनीत किया वो दर्शकों के दिलों पर छा गया , जैसे १९७१ में आयी  ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म "आनंद" का किरदार।  ईसा भाई सूरतवाला का किरदार एक ऐसा किरदार है जिसे आज भी दर्शक याद करते हैं और उसका बोला संवाद  "जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है जहांपनाह। हम सब रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है। कब, कौन, कैसे उठेगा, कोई नहीं बता सकता।' कहते है कि यह किरदार फिल्म में बहुत ही छोटा था और उस समय जॉनी फिल्म के नायक के बराबर की भूमिका करते थे। फिल्म "आनंद "  की इस छोटी भूमिका के लिए ऋषिकेश मुखर्जी ने उन्हें बड़ी मुश्किल से तैयार किया। 

सन १९५१ में फिल्म "बाज़ी " से अपना अभिनय सफर शुरू करने वाले  जॉनी वॉकर ने ने १९८८ तक लगातार अपने अभिनय से दर्शकों को हँसाया। लेकिन इसके बाद अश्लील हास्य और द्विअर्थी संवादों की वजह से वो फिल्मों से दूर हो गये लेकिन जब १९९७ में अभिनेता कमल हासन ने उन्हें फिल्म "चाची ४२० " के लिए अप्रोच किया तो वो मना नहीं कर सके। जॉनी वॉकर को उनके हास्य अभिनय के लिये फिल्म "शिकार " के लिए फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला था। इसी तरह फिल्म "मधुमती " के लिए सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला था। 

ऐसा शराबी जिसने कभी शराब नही पी -- केश्टो मुखर्जी

हास्य अभिनेता केश्टो मुखर्जी का नाम आते ही हम सभी की आँखों के आगे के एक ऐसे शराबी का चेहरा सामने आने लगता है जो दारु के नशे में बात करता है और लड़खड़ा कर चलता है और ऐसे संवाद बोलता है जिसे सुनकर देखकर हम हँस - हँस कर लोट पोट हो जाते हैं। केश्टो मुखर्जी ऐसे हास्य कलाकार थे जिन्होंने फिल्मों में सबसे ज्यादा शराबी की भूमिकायें अभिनीत की। जबकि असली जिंदगी में उन्होंने कभी दारु नहीं पी।

केश्टो मुखर्जी का जन्म ७ अगस्त १९०५ को मुंबई यानि उस समय के बॉम्बे में हुआ था। उन्होंने अपने अभिनय सफर की शुरुआत बंगाली फिल्मों से की। उन्होंने  लोकप्रिय निर्देशक ऋत्विक घटक की बारी थेके पालिये ,अजंत्रिक , नागरिक और जुक्ति टक्को आर गप्पो आदि फिल्मों में काफी महत्वपूर्ण भूमिकायें अभिनीत की। यूं तो केश्टो ने सन १९५७ में फिल्म "मुसाफिर " हिंदी फिल्मों में अपनी शुरुआत की। लेकिन शराबी की भूमिका जिसके लिए वो लोकप्रिय हुए उन्हें १९७० में रिलीज़ फिल्म " माँ और ममता " में मिली। 

हुआ कुछ यूँ कि निर्देशक असित सेन को एक ऐसे अभिनेता की जरूरत थी जो शराबी का किरदार अभिनीत कर सके और केश्टो मुखर्जी को काम की तलाश थी। हालाँकि इस फिल्म से पहले केश्टो ने मुसाफिर , खजांची , राखी और रायफल , मासूम , परख , आरती, आशिक , प्रेम पत्र , असली नकली ,राहु केतु ,बीवी और मकान , मँझली दीदी ,  अपना घर अपनी कहानी ,पड़ोसन , पिंजरे के पंछी और अनोखी रात आदि फिल्मों में काम किया था। 

निर्देशक असित सेन ने अपनी फिल्म में केश्टो को शराबी की भूमिका दी और केश्टो ने भी उस भूमिका को ऐसे निभाया कि उनका शराबी किरदार  दर्शक क्या फिल्म निर्माता- निर्देशकों को भी बेहद पसंद आया बस फिर क्या था जब भी किसी फिल्म में शराबी की भूमिका हो अभिनेता बस केश्टो ही होते थे। हर फिल्म में शराबी की उनकी भूमिका इतनी सशक्त होती थी कि लोग समझने लगे कि वो पक्के शराबी हैं। जबकि असल में ऐसा बिलकुल भी नहीं था।

कहा जाता है  कि एक फिल्म में केश्टो ने कुत्ते की भी आवाज़ निकाली थी। उन्हें काम की तलाश थी तो वो फिल्म निर्देशकों  से मिलते रहते थे। इसी तरह केश्टो बिमल दा से भी मिले लेकिन केश्टो के योग्य उनके पास कोई किरदार नहीं था। उन्होंने उन्हें मना किया कि अभी उनकी फिल्म में कोई भूमिका नहीं है  लेकिन इसके बावजूद भी केश्टो गये नहीं उनके पास ही खड़े रहे तब बिमल दा को गुस्सा आ गया और उन्होंने उनसे पूछा कि क्या कुत्ते की आवाज़ निकाल सकते हो। केश्टो भी कहाँ पीछे हटने वाले थे उन्होंने कुत्ते की आवाज़ निकाल कर विमल दा को भी अचम्भित कर दिया।

शराबी की भूमिकाओं के अलावा भी कुछ फ़िल्में ऐसी हैं जिनमें केश्टो ने बेहतरीन काम किया। उन्होंने गुलज़ार की फिल्म "मेरे अपने" में अभिनेत्री मीना कुमारी के दूर के रिश्तेदार का किरदार अभिनीत किया था। इसी तरह गुलज़ार की फिल्म "परिचय " में उन्होंने बच्चों को पढ़ाने वाले टीचर की भूमिका की। जिसे बच्चे डरा कर भगा देते हैं।फिल्म जंजीर , शोले  और आपकी कसम में उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया। तीसरी कसम में केश्टो ने राज कपूर के साथ काम किया। फिल्म "साधु सुर शैतान" के अलावा फिल्म "पड़ोसन " में उन्होंने अभिनेता किशोर कुमार के साथ काम किया। इसी तरह अभिनेता महमूद की फिल्म "बॉम्बे टू गोवा " में एक ऊंघते हुए यात्री का किरदार अभिनीत किया।

यूँ तो केश्टो मुखर्जी ने अनेकों फिल्मों में अभिनय किया है लेकिन जब - जब उनकी फिल्मों का जिक्र होगा तब उनकी फिल्म  "पड़ोसन" , पिया का घर , तीसरी कसम , गुड्डी, चुपके चुपके ,  लोफर , जंजीर ,द बर्निग ट्रेन ,गोलमाल ,खूबसूरत  आदि फिल्मों का नाम जरूर लिया जायेगा।  १५० के करीब फिल्मों में अभिनय करने वाले केश्टो मुखर्जी की मृत्यु २ मार्च १९८२ को हुई। उनकी बेटी सुष्मिता मुखर्जी फिल्मों और टी वी में आज भी काम करती हैं और उनके बेटे  बबलू मुखर्जी क्या करते हैं नहीं पता लेकिन एक समय में उन्होंने अनेकों टी वी धारावाहिकों में काम किया है।  

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